Lawrence Wong and Jogi Aditya Nath

भारत–सिंगापुर आर्थिक सहयोग: वैश्विक पूंजी प्रवाह के नए चरण की ओर

वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रही है जहाँ पूंजी निवेश के पारंपरिक केंद्र—जैसे कि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन—धीरे-धीरे आपूर्ति शृंखला विविधीकरण (Supply Chain Diversification) की रणनीति अपना रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, 2025–26 के दौरान उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सकल पूंजी निर्माण (Gross Capital Formation) की वृद्धि दर 5.2% रहने का अनुमान है, जो विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में लगभग दोगुनी है। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.5%–6.8% के बीच अनुमानित है, जबकि वैश्विक औसत 3.1% के आसपास बना हुआ है।

विश्व बैंक (World Bank) के ताजा आकलनों के अनुसार, उच्च ब्याज दरों के बावजूद एशिया-प्रशांत क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का प्रवाह 2024–25 में लगभग 8% बढ़ा है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अब चीन-प्लस-वन रणनीति के तहत उत्पादन और सेवा नेटवर्क को दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत जैसे बाजारों में स्थानांतरित कर रही हैं। 1997 के एशियाई वित्तीय संकट के बाद यह पहली बार है जब क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारियाँ पूंजी प्रवाह को इतना प्रभावित कर रही हैं।

इसी व्यापक मैक्रोइकॉनॉमिक पृष्ठभूमि में भारत और सिंगापुर के बीच उभरती रणनीतिक साझेदारी को देखा जाना चाहिए, जो केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं है बल्कि निवेश, डिजिटल अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स और वित्तीय सेवाओं तक विस्तारित हो रही है।

नीति संकेत: उच्चस्तरीय राजनयिक संवाद और निवेश ढांचा

हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सिंगापुर यात्रा के दौरान सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग के साथ हुई बैठक ने भारत–सिंगापुर आर्थिक संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाने के संकेत दिए हैं। इस संवाद में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दोनों देशों के बीच Comprehensive Strategic Partnership को और सुदृढ़ करने पर जोर दिया गया।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2023–24 में सिंगापुर भारत में कुल FDI का लगभग 23% स्रोत रहा, जिसका कुल मूल्य $17.2 बिलियन के आसपास था। सिंगापुर पहले से ही भारत का सबसे बड़ा निवेशक बना हुआ है। उत्तर प्रदेश, जो भारत की तीसरी सबसे बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था है, अब विनिर्माण, डेटा सेंटर, और फिनटेक निवेश के लिए एक संभावित केंद्र के रूप में उभर रहा है।

इस बैठक के बाद बाजारों में तत्काल प्रतिक्रिया देखने को मिली। रुपये में हल्की मजबूती दर्ज की गई, जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक कंपनियों के शेयरों में 1.2%–1.8% तक की बढ़त देखी गई। बॉन्ड यील्ड स्थिर रही, जो निवेशकों के भरोसे को दर्शाती है कि दीर्घकालिक निवेश प्रवाह में स्थिरता आ सकती है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह साझेदारी लॉजिस्टिक्स, स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और डिजिटल भुगतान नेटवर्क तक विस्तारित होती है, तो अगले तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश में FDI प्रवाह 12%–15% तक बढ़ सकता है।

सेक्टोरल प्रभाव: विनिर्माण से लेकर एमएसएमई तक

इस रणनीतिक साझेदारी का सबसे बड़ा प्रभाव विनिर्माण क्षेत्र पर पड़ने की संभावना है। उत्तर प्रदेश पहले से ही डिफेंस कॉरिडोर, टेक्सटाइल पार्क और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण क्लस्टर जैसे क्षेत्रों में निवेश आकर्षित कर रहा है। सिंगापुर की कंपनियाँ स्मार्ट वेयरहाउसिंग, शहरी गतिशीलता (Urban Mobility), और फिनटेक इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के अवसर तलाश रही हैं।

एमएसएमई क्षेत्र के लिए यह सहयोग विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के अनुसार, MSME सेक्टर भारत के कुल रोजगार का लगभग 30% प्रदान करता है। यदि विदेशी निवेश से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण होता है, तो उत्पादकता में सुधार के साथ रोजगार सृजन की दर भी बढ़ सकती है।

उपभोक्ता मांग पर भी सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है। बेहतर अवसंरचना और निवेश से ग्रामीण-शहरी कनेक्टिविटी में सुधार होगा, जिससे खपत आधारित वृद्धि (Consumption-Led Growth) को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, स्थिर पूंजी प्रवाह से रुपये की विनिमय दर में अस्थिरता कम हो सकती है, जो आयात लागत को नियंत्रित रखने में सहायक होगा।

वैश्विक तुलना: उभरते बाजारों की प्रतिस्पर्धा

भारत–सिंगापुर सहयोग की तुलना यदि वियतनाम या इंडोनेशिया जैसे उभरते बाजारों से की जाए, तो भारत की घरेलू मांग और डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र इसे एक अलग बढ़त प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, वियतनाम ने हाल के वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में महत्वपूर्ण प्रगति की है, जबकि इंडोनेशिया ने निकेल निर्यात आधारित औद्योगिक नीति अपनाई है।

इसके विपरीत, भारत सेवा क्षेत्र, फिनटेक और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश आकर्षित कर रहा है, जो उच्च मूल्य वर्धित आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है। सिंगापुर जैसे वित्तीय केंद्र के साथ साझेदारी भारत को वैश्विक पूंजी बाजारों तक बेहतर पहुँच प्रदान कर सकती है।

भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी यह सहयोग महत्वपूर्ण है, क्योंकि दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के बीच व्यापार गलियारों को मजबूत करने से आपूर्ति शृंखला की स्थिरता बढ़ सकती है।

दीर्घकालिक रणनीतिक संकेत: अगले 24 महीनों का दृष्टिकोण

आने वाले 12–24 महीनों में यह साझेदारी भारत के शहरीकरण और औद्योगिक विकास मॉडल को प्रभावित कर सकती है। यदि निवेश प्रतिबद्धताएँ वास्तविक परियोजनाओं में परिवर्तित होती हैं, तो स्मार्ट सिटी, डेटा सेंटर, और लॉजिस्टिक्स हब जैसे क्षेत्रों में तेज़ी देखने को मिल सकती है।

हालाँकि, जोखिम भी बने हुए हैं—जैसे कि वैश्विक मुद्रास्फीति, पूंजी लागत में वृद्धि, और भू-राजनीतिक अनिश्चितता। यदि विकसित अर्थव्यवस्थाएँ ब्याज दरों को लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनाए रखती हैं, तो उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह अस्थिर हो सकता है।

निवेशक व्यवहार में भी बदलाव देखने को मिल सकता है, जहाँ दीर्घकालिक इंफ्रास्ट्रक्चर फंड और संप्रभु संपत्ति कोष (Sovereign Wealth Funds) अब अधिक स्थिर और नीति-संगत बाजारों की तलाश कर रहे हैं।

कुल मिलाकर, भारत–सिंगापुर आर्थिक सहयोग एक ऐसे चरण में प्रवेश कर रहा है जहाँ द्विपक्षीय संवाद से आगे बढ़कर संरचनात्मक निवेश और नीति समन्वय पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।